क्यों मैं हरपल रोता ही रहा हूँ | The Pen Poetry Blog
क्यों मैं हरपल रोता ही रहा हूँ।।
बुझ गए सारे दियें, अब हो गया अंधेरा,
साथी न दोस्त, अब कोई नही है मेरा,
आख़िर किसके लिए मैं जीता ही रहा हूँ,
क्यों मैं सब-कुछ खोता ही रहा हूँ,
क्यों मैं हरपल रोता ही रहा हूँ।।
अब तो हँस रहा है हालत पे मेरे ये सारा ज़माना,
क्या दुःख है मुझें, ये किसी ने कभी न जाना।
ख़ामोश-सा चेहरा लिए फिरता ही रहा हूँ,
क्यों मैं सब-कुछ खोता ही रहा हूँ,
क्यों मैं हरपल रोता ही रहा हूँ।।
रास न आये ये तौर-तरीके, ये सर्द-फ़िज़ाये,
मेरे अश्कों को छुपाती ये सावन की घटाएं,
ग़मो को अपने हरदम छुपाता ही रहा हूँ,
क्यों मैं सब-कुछ खोता ही रहा हूँ,
क्यों मैं हरपल रोता ही रहा हूँ।।
~मोHit Iyer #review











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